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वन पर्व
अध्याय २१८
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मार्कण्डेय़ उवाच
श्रिय़ा जुष्टः पृथुय़शाः स कुमारवरस्तदा |  ४   क
निषण्णो दृश्यते भूतैः पौर्णमास्यां यथा शशी ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति