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वन पर्व
अध्याय २१८
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मार्कण्डेय़ उवाच
अथैनमभ्ययुः सर्वा देवसेनाः सहस्रशः |  ४०   क
अस्माकं त्वं पतिरिति व्रुवाणाः सर्वतोदिशम् ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति