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वन पर्व
अध्याय २१८
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मार्कण्डेय़ उवाच
अय़ं तस्याः पतिर्नूनं विहितो व्रह्मणा स्वय़म् |  ४३   क
इति चिन्त्यानय़ामास देवसेनां स्वलङ्कृताम् ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति