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वन पर्व
अध्याय २९४
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वैशम्पाय़न उवाच
सहजं वर्म मे विप्र कुण्डले चामृतोद्भवे |  १०   क
तेनावध्योऽस्मि लोकेषु ततो नैतद्ददाम्यहम् ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति