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वन पर्व
अध्याय २१८
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मार्कण्डेय़ उवाच
एवं स्कन्दस्य महिषीं देवसेनां विदुर्वुधाः |  ४७   क
षष्ठीं यां व्राह्मणाः प्राहुर्लक्ष्मीमाशां सुखप्रदाम् |  ४७   ख
सिनीवालीं कुहूं चैव सद्वृत्तिमपराजिताम् ||  ४७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति