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वन पर्व
अध्याय २१८
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मार्कण्डेय़ उवाच
यदा स्कन्दः पतिर्लव्धः शाश्वतो देवसेनय़ा |  ४८   क
तदा तमाश्रय़ल्लक्ष्मीः स्वय़ं देवी शरीरिणी ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति