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वन पर्व
अध्याय २१८
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मार्कण्डेय़ उवाच
अपूजय़न्महात्मानो व्राह्मणास्तं महावलम् |  ५   क
इदमाहुस्तदा चैव स्कन्दं तत्र महर्षय़ः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति