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वन पर्व
अध्याय २१८
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मार्कण्डेय़ उवाच
हिरण्यवर्ण भद्रं ते लोकानां शङ्करो भव |  ६   क
त्वय़ा षड्रात्रजातेन सर्वे लोका वशीकृताः ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति