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वन पर्व
अध्याय २१८
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मार्कण्डेय़ उवाच
अभय़ं च पुनर्दत्तं त्वय़ैवैषां सुरोत्तम |  ७   क
तस्मादिन्द्रो भवानस्तु त्रैलोक्यस्याभय़ङ्करः ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति