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आदि पर्व
अध्याय २१९
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वैशम्पाय़न उवाच
भूतसङ्घसहस्राश्च दीनाश्चक्रुर्महास्वनम् |  २८   क
रुरुवुर्वारणाश्चैव तथैव मृगपक्षिणः |  २८   ख
तेन शव्देन वित्रेसुर्गङ्गोदधिचरा झषाः ||  २८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति