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शान्ति पर्व
अध्याय २१९
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नमुचिरु उवाच
प्राज्ञस्य कर्माणि दुरन्वय़ानि; न वै प्राज्ञो मुह्यति मोहकाले |  १९   क
स्थानाच्च्युतश्चेन्न मुमोह गौतम; स्तावत्कृच्छ्रामापदं प्राप्य वृद्धः ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति