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विराट पर्व
अध्याय ५०
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अर्जुन उवाच
एतस्य रथमास्थाय़ राधेय़स्य दुरात्मनः |  १६   क
यत्तो भवेथाः सङ्ग्रामे स्पर्धत्येष मय़ा सदा ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति