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वन पर्व
अध्याय १९५
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मार्कण्डेय़ उवाच
सभाज्य चैनं विविधैराशीर्वादैस्ततो नृपम् |  ३३   क
देवा महर्षय़श्चैव स्वानि स्थानानि भेजिरे ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति