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वन पर्व
अध्याय २१९
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मार्कण्डेय़ उवाच
एवमुक्ते तु शक्रेण त्रिदिवं कृत्तिका गताः |  ११   क
नक्षत्रं शकटाकारं भाति तद्वह्निदैवतम् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति