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वन पर्व
अध्याय २१९
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मातर ऊचुः
परिरक्षाम भद्रं ते प्रजाः स्कन्द यथेच्छसि |  २१   क
त्वय़ा नो रोचते स्कन्द सहवासश्चिरं प्रभो ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति