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वन पर्व
अध्याय २१९
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मार्कण्डेय़ उवाच
अपतत्स तदा भूमौ विसञ्ज्ञोऽथ क्षुधान्वितः |  २५   क
स्कन्देन सोऽभ्यनुज्ञातो रौद्ररूपोऽभवद्ग्रहः |  २५   ख
स्कन्दापस्मारमित्याहुर्ग्रहं तं द्विजसत्तमाः ||  २५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति