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वन पर्व
अध्याय २१९
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मार्कण्डेय़ उवाच
इमे त्वष्टादशान्ये वै ग्रहा मांसमधुप्रिय़ाः |  ३५   क
द्विपञ्चरात्रं तिष्ठन्ति सततं सूतिकागृहे ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति