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वन पर्व
अध्याय २१९
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मार्कण्डेय़ उवाच
ऊर्ध्वं तु षोडशाद्वर्षाद्ये भवन्ति ग्रहा नृणाम् |  ४५   क
तानहं सम्प्रवक्ष्यामि नमस्कृत्य महेश्वरम् ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति