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वन पर्व
अध्याय २१९
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मार्कण्डेय़ उवाच
आसीनश्च शय़ानश्च यः पश्यति नरः पितॄन् |  ४७   क
उन्माद्यति स तु क्षिप्रं स ज्ञेय़स्तु पितृग्रहः ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति