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वन पर्व
अध्याय २१९
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मार्कण्डेय़ उवाच
अवमन्यति यः सिद्धान्क्रुद्धाश्चापि शपन्ति यम् |  ४८   क
उन्माद्यति स तु क्षिप्रं ज्ञेय़ः सिद्धग्रहस्तु सः ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति