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वन पर्व
अध्याय २१९
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मार्कण्डेय़ उवाच
उपाघ्राति च यो गन्धान्रसांश्चापि पृथग्विधान् |  ४९   क
उन्माद्यति स तु क्षिप्रं स ज्ञेय़ो राक्षसो ग्रहः ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति