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वन पर्व
अध्याय २१९
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मार्कण्डेय़ उवाच
अक्षय़श्च भवेत्स्वर्गस्त्वत्प्रसादाद्धि नः प्रभो |  ५   क
त्वां पुत्रं चाप्यभीप्सामः कृत्वैतदनृणो भव ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति