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वन पर्व
अध्याय २१९
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मार्कण्डेय़ उवाच
आविशन्ति च यं यक्षाः पुरुषं कालपर्यये |  ५१   क
उन्माद्यति स तु क्षिप्रं ज्ञेय़ो यक्षग्रहस्तु सः ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति