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वन पर्व
अध्याय २१९
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मार्कण्डेय़ उवाच
वैक्लव्याच्च भय़ाच्चैव घोराणां चापि दर्शनात् |  ५४   क
उन्माद्यति स तु क्षिप्रं सत्त्वं तस्य तु साधनम् ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति