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वन पर्व
अध्याय २१९
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मार्कण्डेय़ उवाच
यावत्सप्ततिवर्षाणि भवन्त्येते ग्रहा नृणाम् |  ५६   क
अतः परं देहिनां तु ग्रहतुल्यो भवेज्ज्वरः ||  ५६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति