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वन पर्व
अध्याय २१९
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मार्कण्डेय़ उवाच
अप्रकीर्णेन्द्रिय़ं दान्तं शुचिं नित्यमतन्द्रितम् |  ५७   क
आस्तिकं श्रद्दधानं च वर्जय़न्ति सदा ग्रहाः ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति