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शान्ति पर्व
अध्याय २२
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वैशम्पाय़न उवाच
भवितव्यं तथा तच्च यद्वृत्तं भरतर्षभ |  १५   क
दिष्टं हि राजशार्दूल न शक्यमतिवर्तितुम् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति