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शान्ति पर्व
अध्याय २२
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वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्रधर्मेण धर्मज्ञ प्राप्य राज्यमनुत्तमम् |  २   क
जित्वा चारीन्नरश्रेष्ठ तप्यते किं भवान्भृशम् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति