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शान्ति पर्व
अध्याय २२
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वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मणस्यापि चेद्राजन्क्षत्रधर्मेण तिष्ठतः |  ६   क
प्रशस्तं जीवितं लोके क्षत्रं हि व्रह्मसंस्थितम् ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति