शान्ति पर्व  अध्याय २२

वैशम्पाय़न उवाच

स भवान्सर्वधर्मज्ञः सर्वात्मा भरतर्षभ |  ८   क
राजा मनीषी निपुणो लोके दृष्टपरावरः ||  ८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति