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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २२
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वैशम्पाय़न उवाच
कर्णं स्मरेथाः सततं सङ्ग्रामेष्वपलाय़िनम् |  ११   क
अवकीर्णो हि स मय़ा वीरो दुष्प्रज्ञय़ा तदा ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति