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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २२
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वैशम्पाय़न उवाच
सदैव भ्रातृभिः सार्धमग्रजस्यारिमर्दन |  १४   क
द्रौपद्याश्च प्रिय़े नित्यं स्थातव्यमरिकर्शन ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति