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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २२
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वैशम्पाय़न उवाच
स मुहूर्तमिव ध्यात्वा धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः |  १८   क
उवाच मातरं दीनश्चिन्ताशोकपराय़णः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति