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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २२
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वैशम्पाय़न उवाच
किमिदं ते व्यवसितं नैवं त्वं वक्तुमर्हसि |  १९   क
न त्वामभ्यनुजानामि प्रसादं कर्तुमर्हसि ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति