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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २२
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वैशम्पाय़न उवाच
क्व सा वुद्धिरिय़ं चाद्य भवत्या या श्रुता मय़ा |  २२   क
क्षत्रधर्मे स्थितिं ह्युक्त्वा तस्याश्चलितुमिच्छसि ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति