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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २२
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वैशम्पाय़न उवाच
स वर्धमानद्वारेण निर्ययौ गजसाह्वय़ात् |  ३   क
विसर्जय़ामास च तं जनौघं स मुहुर्मुहुः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति