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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २२
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वैशम्पाय़न उवाच
सा पुत्रान्रुदतः सर्वान्मुहुर्मुहुरवेक्षती |  ३१   क
जगामैव महाप्राज्ञा वनाय़ कृतनिश्चय़ा ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति