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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २२
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वैशम्पाय़न उवाच
अन्वय़ुः पाण्डवास्तां तु सभृत्यान्तःपुरास्तदा |  ३२   क
ततः प्रमृज्य साश्रूणि पुत्रान्वचनमव्रवीत् ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति