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सभा पर्व
अध्याय २२
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वैशम्पाय़न उवाच
अक्षतः शस्त्रसम्पन्नो जितारिः सह राजभिः |  १३   क
रथमास्थाय़ तं दिव्यं निर्जगाम गिरिव्रजात् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति