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सभा पर्व
अध्याय २२
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वैशम्पाय़न उवाच
चिन्तय़ामास कृष्णोऽथ गरुत्मन्तं स चाभ्ययात् |  २२   क
क्षणे तस्मिन्स तेनासीच्चैत्ययूप इवोच्छ्रितः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति