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सभा पर्व
अध्याय २२
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वैशम्पाय़न उवाच
स निर्ययौ महावाहुः पुण्डरीकेक्षणस्ततः |  २८   क
गिरिव्रजाद्वहिस्तस्थौ समे देशे महाय़शाः ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति