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सभा पर्व
अध्याय २२
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वैशम्पाय़न उवाच
विष्णो समवसन्नानां गिरिदुर्गे सुदारुणे |  ३३   क
दिष्ट्या मोक्षाद्यशो दीप्तमाप्तं ते पुरुषोत्तम ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति