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सभा पर्व
अध्याय २२
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः क्षीणे जरासन्धे भ्रातृभ्यां विहितं जय़म् |  ४८   क
अजातशत्रुरासाद्य मुमुदे भ्रातृभिः सह ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति