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वन पर्व
अध्याय २२
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वासुदेव उवाच
उपय़ात्वाद्य शाल्वेन द्वारकां वृष्णिनन्दन |  १३   क
विषक्ते त्वय़ि दुर्धर्ष हतः शूरसुतो वलात् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति