वन पर्व  अध्याय २२

वासुदेव उवाच

तदलं साधु युद्धेन निवर्तस्व जनार्दन |  १४   क
द्वारकामेव रक्षस्व कार्यमेतन्महत्तव ||  १४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति