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वन पर्व
अध्याय २२
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वासुदेव उवाच
अहं हि द्वारकाय़ाश्च पितुश्च कुरुनन्दन |  १७   क
तेषु रक्षां समाधाय़ प्रय़ातः सौभपातने ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति