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वन पर्व
अध्याय २२
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वासुदेव उवाच
वलदेवो महावाहुः कच्चिज्जीवति शत्रुहा |  १८   क
सात्यकी रौक्मिणेय़श्च चारुदेष्णश्च वीर्यवान् |  १८   ख
साम्वप्रभृतय़श्चैवेत्यहमासं सुदुर्मनाः ||  १८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति