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वन पर्व
अध्याय १४९
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वैशम्पाय़न उवाच
तस्माद्देशे च दुर्गे च शत्रुमित्रवलेषु च |  ४०   क
नित्यं चारेण वोद्धव्यं स्थानं वृद्धिः क्षय़स्तथा ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति