वन पर्व  अध्याय २३१

वैशम्पाय़न उवाच

शीतवातातपसहांस्तपसा चैव कर्शितान् |  १८   क
समस्थो विषमस्थान्हि द्रष्टुमिच्छति दुर्मतिः ||  १८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति