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वन पर्व
अध्याय २२
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वासुदेव उवाच
ततो मुहूर्तात्प्रतिलभ्य सञ्ज्ञा; महं तदा वीर महाविमर्दे |  २९   क
न तत्र सौभं न रिपुं न शाल्वं; पश्यामि वृद्धं पितरं न चापि ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति